रविवार, 24 अक्टूबर 2010

स्वयं में डूबो


एक राजा ने किसी सामान्यत: स्वस्थ और संतुलित व्यक्ति को कैद कर लिया था- एकाकीपन का मनुष्य पर क्या प्रभाव होता है, इस अध्ययन के लिए। वह व्यक्ति कुछ समय तक चीखता रहा चिल्लाता रहा। बाहर जाने के लिए रोता था, सिर पटकता था- उसकी सारी सत्ता जो बाहर थी। सारा जीवन तो 'पर' से अन्य बंधा था। अपने में तो वह कुछ भी नहीं था। अकेला होना न होने के ही बराबर था। वह धीरे-धीरे टूटने लगा। उसके भीतर कुछ विलीन होने लगा, चुप्पी आ गई। रुदन भी चला गया। आंसू भी सूख गये और आंखें ऐसे देखने लगीं, जैसे पत्थर हों। वह देखता हुआ भी लगता जैसे नहीं देख रहा है। दिन बीते, वर्ष बीत गया। उसकी सुख सुविधा की सब व्यवस्था थी। जो उसे बाहर उपलब्ध नहीं था, वह सब कैद में उपलब्ध था। शाही आतिथ्य जो था! लेकिन वर्ष पूरे होने पर विशेषज्ञों ने कहा, 'वह पागल हो गया है।'

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शिक्षक में विद्रोह की ज्वलंत अग्नि होनी चाहिए


मेरी दृष्टि में कोई भी व्यक्ति ठीक अर्थों में शिक्षक तभी हो सकता है जब उसमें विद्रोह की एक अत्यंत ज्वलंत अग्नि हो। जिस शिक्षक के भीतर विद्रोह की अग्नि नहीं है वह केवल किसी न किसी निहित, स्वार्थ का, चाहे समाज, चाहे धर्म, चाहे राजनीति, उसका एजेंट होगा। शिक्षक के भीतर एक ज्वलंत अग्नि होनी चाहिए विद्रोह की, चिंतन की, सोचने की। लेकिन क्या हममें सोचने की अग्नि है और अगर नहीं है तो आप भी एक दुकानदार हैं। शिक्षक होना बड़ी और बात है। शिक्षक होने का मतलब क्या है? क्या हम सोचते हैं-आप बच्चों को सिखाते होंगे, सारी दुनिया में सिखाया जाता है बच्चों को, बच्चों को सिखाया जाता है, प्रेम करो! लेकिन कभी आपने विचार किया है कि आपकी पूरी शिक्षा की व्यवस्था प्रेम पर नहीं, प्रतियोगिता पर आधारित है। किताब में सिखाते हैं प्रेम करो और आप की पूरी व्यवस्था, पूरा इंतजाम प्रतियोगिता का है।

जहां प्रतियोगिता है वहां प्रेम कैसे हो सकता है। जहां काम्पिटीशन है, प्रतिस्पर्धा है...


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स्वयं को जाने बिना ज्ञान नहीं


ज्ञान के लिए पिपासा है। कितनी प्यास है? प्रत्येक में देखता हूं। कुछ भीतर प्रज्ज्वलित है, जो शांत होना चाहता है और मनुष्य कितनी दिशाओं में खोजता है। शायद अनंत जन्मों से उसकी यह खोज चली आ रही है। पर हर चरण पर निराशा के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं आता है। कोई रास्ता पहुंचता हुआ नहीं दिखता है। क्या रास्ते कहीं भी नहीं ले जाते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना है। जीवन स्वयं इसका उत्तर है। क्या अनंत मार्गो और दिशाओं में चलकर उत्तर नहीं मिल गया है?
बौद्धिक उत्तर खोजने में, उसके धुएं में, वास्तविक उत्तर खो जाता है। बुद्धि चुप हो तो अनुभूति बोलती है। विचार मौन हों तो विवेक जाग्रत होता है।


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अकेले आए हैं, और हम अकेले जाएंगे


सदियों से यह बार-बार कहा जाता है। सारे धार्मिक लोग यह कहते रहे हैं: "हम इस जगत में अकेले आए हैं, और हम अकेले जाएंगे।' सारा साथ होना माया है। साथ होने का विचार ही इस कारण आता है क्योंकि हम अकेले हैं, और अकेलापन तकलीफ देता है। हम अपने अकेलेपन को रिश्ते में डुबो देना चाहते हैं...इसी कारण हम प्रेम में इतना उलझ जाते हैं। इस बिंदु को देखने की कोशिश करो। सामान्यतया तुम सोचते हो कि तुम पुरुष या स्त्री के प्रेम में पड़ गए क्योंकि वह सुंदर है। यह सत्य नहीं है। सत्य इसके ठीक विपरीत है: तुम प्रेम में पड़े क्योंकि तुम अकेले नहीं रह सकते। तुम्हें गिरना ही पड़ेगा। तुम अपने को इस या उस तरह से टालने ही वाले थे। और यहां ऐसे लोग हैं जो स्त्री या पुरुष के प्रेम में नहीं पड़ते--तब वे धन के प्रेम में पड़ते हैं। वे धन की तरफ या शक्ति की तरफ जाने लगते हैं, वे राजनेता बन जाते हैं। वह भी तुम्हारे अकेलेपन को टालना है। यदि तुम मनुष्य को देखो, यदि तुम स्वयं को गहराई से देखो, तुम आश्चर्यचकित होओगे--तुम्हारी सारी गतिविधियों को एक अकेले स्रोत में सिकोड़ा जा सकता है। स्रोत यह है कि तुम अपने अकेलेपन से डरते हो। बाकी सारी बातें तो बहाने मात्र हैं। वास्तविक कारण यह है कि तुम अपने को बहुत अधिक अकेला पाते हो।

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जो है वह मिट नहीं सकता


परमात्मा पर एक छलांग और लगानी पड़ेगी, वहां तर्क सारा तोड़ देना पड़ेगा। परमात्मा यानी अस्तित्व, जो है। सिर्फ है। इज़नेस, होना जिसका गुण है। हम कुछ भी करें, उसके होने में कोई अंतर नहीं पड़ता। इसे वैज्ञानिक किसी और ढंग से कहते हैं। वे कहते हैं, हम किसी चीज को नष्ट नहीं कर सकते। इसका मतलब हुआ कि हम किसी चीज को है-पन के बाहर नहीं निकाल सकते। अगर हम एक कोयले के टुकड़े को मिटाना चाहें, तो हम राख बना लेंगे। लेकिन राख रहेगी। हम उसे चाहे सागर में फेंक दें-वह पानी में घुलकर डूब जाएगी, दिखाई नहीं पड़ेगी, लेकिन रहेगी। हम सब कुछ मिटा सकते हैं, लेकिन उसकी इज़नेस, उसके होने को नहीं मिटा सकते। उसका होना कायम रहेगा। हम कुछ भी करते चले जाएं, उसके होने में कोई अंतर नहीं पड़ेगा। होना बाकी रहेगा। हां, होने को हम शकल दे सकते हैं। हम हजार शकलें दे सकते हैं। हम नए-नए रूप और आकार दे सकते हैं। हम आकार बदल सकते हैं, लेकिन जो है उसके भीतर, उसे हम नहीं बदल सकते। वह रहेगा।


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अतीत या भविष्य



अतीत जा चुका और भविष्य अभी आया नहीं : दोनों ही दिशाओं को अस्तित्व नहीं है उधर जाना बेवहज है। कभी एक दिशा होती थी, लेकिन अब नहीं है, और एक अभी होना शुरू भी नहीं हुई है। सही व्यक्ति सिर्फ वही है जो क्षण-क्षण जीता है, जिसका तीर क्षण की तरफ होता है, जो हमेशा अभी और यहां है; जहां कहीं वह है, उसकी संपूर्ण चेतना, उसका पूर्ण होना, यहां के यथार्थ और अभी के यथार्थ में होता है। यही एकमात्र सही दिशा है। सिर्फ ऐसा ही व्यक्ति स्वर्ण द्वार में प्रवेश कर सकता है। वर्तमान ही वह स्वर्ण द्वार है। यहां-अभी स्वर्ण द्वार है...और तुम तभी वर्तमान में हो सकते हो जब तुम महत्वाकांक्षी नहीं हो--कुछ पाने की इच्छा नहीं रखत: शक्ति, धन, सम्मान, बुद्धत्व तक भी को पाने की कोई चाह नहीं क्योंकि सभी महत्वाकांक्षाएं तुम्हें भविष्य में ले जाती हैं। सिर्फ गैर-महत्वाकांक्षी व्यक्ति वर्तमान में हो सकता है। जो व्यक्ति वर्तमान में होना चाहता है उसे सोचना नहीं चाहिए, वह सिर्फ द्वार को देखे और प्रवेश कर जाए। अनुभव होगा, परंतु अनुभव के....


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एक नई धार्मिकता की शुरुआत


पढ़े क्लिक करे क्लिक भांति कार्य करता है। वह तुम्हारा हाथ पकड कर तुम्हें ठीक मार्ग पर ले जाता है। तुम्हारी आंखें खोलने में तुम्हारी सहायता करता है, और वह तुम्हें मन के पार जाने में सहायता देता है। तभी तुम्हारी तीसरी आंख खुलती है, तब तुम अपने अंदर देखना शुरू करते हो। एक बार तुम अपने अंदर देखने लगते हो, फिर सदगुरु का कार्य समाप्त हो जाता है। अब यह तुम पर ही निर्भर करता है।

तुम अपने मन और अमन के छोटे से अंतराल को एक क्षण में अत्यंत तीव्रता से और शीघ्रता से लांघ सकते हो। या आगे तुम बहुत धीमे-धीमे, झिझकते और रुकते हुए यात्रा कर सकते हो, इस बात से डरते हुए कि तुम अपने मन पर और अपनी निजता पर अपनी पकड खोते जा रहे हो, और कि सभी सीमाएं खोती जा रही हैं। तुम क्या कर रहे हो? तुम क्षण भर के लिए यह सोच सकते हो कि इससे सब कुच समाप्त हो सकता है या तुम फिर मन में वापस लौटने में समर्थ हो सकोगे। और कौन जानता है कि आगे क्या होने जा रहा है? सब कुछ विलुप्त होते जा रहा है

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